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  • मुनाफे की हवस के कारण बढ़ती औद्योगिक दुर्घटनाएं

    मुनाफे की हवस के कारण बढ़ती औद्योगिक दुर्घटनाएं

    आज हम एक ऐसी व्यवस्था में जी रहे हैं जहां विज्ञान द्वारा अर्जित किए गए तमाम ज्ञान का इस्तेमाल समाज की तरक्की के लिए नहीं बल्कि ज्यादा से ज्यादा मुनाफे के लिए होता है। प्रकृति का असीमित दोहन करके निजी मुनाफे के लिए हर संभव कोशिशें की जाती है। अंत में इसका खामियाजा पूरे समाज को ही भुगतना पड़ता है।

    1984 की भोपाल गैस त्रासदी कि वह दर्दनाक रात आज तक भुलाई नहीं जा सकी है जिसमें यूनियन कार्बाइड की फैक्टरी से मीथेन आइसो साइनाइड गैस लीक होने से रातों रात 4000 से ज्यादा लोग मारे गए।लेकिन ऐसी घटनाएं रुक नहीं रही है सिर्फ हालिया कुछ दिनों में ही हमारे सामने कई ऐसी घटनाएं सामने आई है। फैक्ट्रियों के अंदर गुलाम बनाकर अमानवीय तरीके से रखे गए मजदूरों की आग लगने से मौत की खबरें लगतार हो रहीं हैं।इसके साथ ही बड़े प्लांट में गैस रिसाव का मामला भी लगातार आ रहा है।

    अभी कुछ दिन पहले विशाखापट्टनम से खतरनाक गैस स्टेरिंग के लीक होने से कई मौतें हुई फिर खबर आई नेवेली से जहां कोयला बॉयलर में ब्लास्ट हुआ फिर रायगढ़ के पेपर मिल से गैस लीक हुआ और फिर खबर आई की सासन में अदानी की कोयले की खान से निकलने वाली कोयले की राख ने वहां के खेतों और तालाबों को खत्म कर दिया है और अब खबर आई है असम में तिनसुकिया जिले के बागजान गांव में स्थित ऑयल इंडिया लिमिटेड के तेल के कुएं से बीते 27 मई को इसके प्लांट के एक कुएं में अंदर दबाव अधिक हो जाने के कारण रिसाव शुरू हो गया, इससे ब्लोआउट कहते हैं।2 हफ्ते तक लगातार हुए रिसाव के बाद इस में आग लग गई जो अभी तक जारी है।यह इतनी भयंकर है कि करीब 30 किलोमीटर दूर से भी इसके धुएं देखे जा सकते हैं।विशेषज्ञों का कहना है कि इसे पूर्ण रूप से काबू करने में 4 हफ्ते लग सकते हैं।वहां के करीब 7000 लोगों पर इसका सीधा असर पड़ा है।आसपास के चाय बागान तबाह हो गए हैं, इसके साथ ही प्लांट से सटे डिब्रू सैखोवा नेशनल पार्क के वन्य जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ा है।इसके साथ दो लोगों की मौत भी हो गई है।वहां के विलुप्त हो रही प्रजातियों पर अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है। स्थानीय झील में डॉल्फिंस के शव भी देखे हैं।

    लेकिन सवाल यह है कि क्या यह घटना महज एक हादसा है या टेक्निकल गलती है जैसा कि ऐसी घटनाओं के बाद प्रचारित किया जाता है। लेकिन इन घटनाओं का ठीक से विश्लेषण करें तो आसानी से समझ आ जाता है कि यह पूंजीवादी व्यवस्था की अवश्यंभावी परिणति है कि वह ऐसी घटनाओं को लगातार जन्म देती है।तिनसुकिया की घटना भी इसी बात को साबित करती है।इस घटना के पीछे का मुख्य सरकारी कंपनी ऑल इंडिया लिमिटेड का निजीकरण कहा जा सकता है।पूंजीवादी व्यवस्था में ज्यादा से ज्यादा मुनाफे के लिए कंपनियां लागत को कम से कम करना चाहती है और यही कारण है कि कंपनियां रखरखाव व वेस्ट पर खर्च करने से बचती हैं। जैसे ही सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का निजीकरण करती है मुनाफे का यह धंधा शुरू हो जाता है।इस मसले में भी ऐसा ही हुआ है।

    2016 में केंद्र सरकार ने असम के 12 सहित 67 छोटी ऑयल फील्ड की का निजीकरण किया। ऑल इंडिया लिमिटेड का समझौता गुजरात की कंपनी जॉन एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड के साथ हुआ। उस समय भी वहां के कर्मचारी निजीकरण का विरोध कर रहे थे। इस घटना के बाद भी मौजूदा कर्मचारी सहित पूर्व कर्मचारी कंपनी पर आरोप लगा रहे हैं कि कंपनी रखरखाव व कर्मचारियों के प्रशिक्षण पर बहुत कम खर्च कर रही है। 

    इसके साथ ही यह भी सवाल उठा रहे हैं कि हर ऑयल बेस्ट कंपनी को ब्लोआउट नियंत्रण करने वाली कंपनी के साथ सलाना समझौता करना होता है लेकिन इस कंपनी का किसी भी कंपनी के साथ कोई समझौता नहीं था।इसके साथ ही जब आग लगी तो चार्टर्ड प्लेन से मदद मंगवाने की जगह कोविड-19 पर देर होने के आरोप मढे गए। बेशक दोनों ही कंपनियों पर एफ आई आर हुए हैं मगर इस व्यवस्था में किस पर कितनी कारवाई होगी सब जानते हैं। जैसा कि भोपाल गैस त्रासदी में मारे गए हजारों लोगों के मौत के जिम्मेदार वारेन एंडरसन के साथ हुआ। छोटी आम धाराएं लगाकर उसे बचाया गया। बिना कोई सजा के वह अपने देश में आराम से रहा।

    बात यहीं खत्म नहीं होती 1984 के इस त्रासदी के बाद 1986 में पर्यावरण सुरक्षा कानून बनाया गया। इसमें कोई भी कारखाना शुरू करने के पहले पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड से लाइसेंस लेना होता था। इसे एक अवधि पर रिन्यू करना होता था। इसके बाद 1994 और 2006 में एनवायरमेंट इंपैक्ट एसेसमेंट नोटिफिकेशन लाया गया।इसमें किसी कारखाने को लगाने के पहले उसके आसपास के लोगों और पर्यावरण पर असर की समीक्षा होनी होती थी और फिर जनता के साथ राय ली जानी होती थी।मगर अब पर्यावरण मंत्रालय पिछले 12 मार्च को EIA नोटिफिकेशन 2020 लाई है जिसमें बिना पूर्व एसेसमेंट के कारखाना खोला जा सकता है और बाद में जुर्माना देकर लाइसेंस लिया जा सकता है। और यह सब कुछ किया जा रहा है चंद लोगों के मुनाफे के लिए।

    – आकाश आनंद

  • ग्रुत्वीय तरंगे और लीगो : ब्रहमांड के रहस्यों के अन्वेषण के खुलते नये द्वार

    ग्रुत्वीय तरंगे और लीगो : ब्रहमांड के रहस्यों के अन्वेषण के खुलते नये द्वार

    अल्बर्ट आइंस्टीन ने 1916 में अपने सपकेक्षिता के सिद्धांत के आधार पर दिक्-काल में त्वरित पिंडो के कारण होने वाली लहरों की हलचलों की परिकल्पना की जो द्रव्यमान को अप्रेक्षनीय मात्रा में धकेलती है | इन्हें ग्रुत्वाकर्ष्ण तरंगे या जी-वेव कहा जाता है | सापेक्षिता का सिद्धांत ग्रुत्वाकर्ष्ण की क्लासिकीय अवधारणा के बरक्स अपने आप में एक क्रांतिकारी विचार था और इसी कारण इसे बहुत विरोधो का सामना करना पड़ा था |

    समय के साथ इस विचार की समझ बढ़ी और इसके पुर्वकथनो के सत्यापन; जैसे किसी भारी पिंड की वजह प्रकाश का मुड़ना, दुनिया भर के मस्तिष्को ने इस सिद्धांत को मान्यता दी | परन्तु, भी हाल तक एक भी ऐसा प्रेक्षण नही हुआ था जो जी-वेव्स का सत्यापन करता |

    1974 में, टेलर और ह्युम के द्वारा एक द्विचर पल्सर के प्रेक्षण के जरिये अप्रत्यक्ष रूप से जी-वेव्स के होने का प्रमाण मिला व इस खोज के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार भी मिला | इन तरंगो के होने का पहला प्रत्यक्ष प्रमाण की घोषणा फरवरी,2016 में की गयी और यह उन्नत लीगो के प्रयोग से सम्भव हो पाया, इसमें दो इंटरफेरोमीटर, जिसमे से पहला हैनफोर्ड,वाशिंगटन तथा दूसरा,लिविन्गस्टोन,ल्यूसियाना में था, इनके एक साथ तारतम्यता में काम करने की वजह से यह सम्भव हो पाया |

    इस वजह से 2017 का नोबेल पुरस्कार रीनर वीस,बेरी और कीप थोर्न को लीगो संसूचक और ग्रुत्त्वीय तरंगो के अवलोकन में महत्वपूर्ण योगदान के लिए संयुक्त रूप से दिया गया | नोबेल पुरस्कार को अधिकतम तीन लोगो को ही दिया जा सकता है और इस अवधारणा के प्रतिपादक यही तीन व्यक्ति थे ,परन्तु विश्वभर के उन इंजीनियरो और वैज्ञानिको के साझा प्रयासों की भी सराहना करनी होगी जो इस महत्वपूर्ण प्रयोग का हिस्सा थे, जिसने अवलोकनीय खगौलविज्ञान व ब्रहमांड विज्ञान में जिसने नए द्वार खोले, हमे अनुसंधान करने के लिए असंख्य नई अवधारणाओं की प्रदान की |

    किन्तु,पहला प्रश्न : ग्रुत्त्वीय तरंगे है क्या ?

    चलिए विद्युत चुम्बकत्व और ग्रुत्वाकर्ष्ण के बीच सम्द्दश्यता खींचते है | हमे यह पता है कि जब एक विद्युत आवेश जो त्वरित गति में हो विद्युत चुम्बकीय तरंग का निर्माण करता है; विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र में विरूपण की लहरे दिक् और कल में अनुप्रस्थीय प्रकार से चलती है, यह अपने साथ उर्जा लेकर चलती है और मार्ग में पड़ने वाले पिंडो को परस्पर प्रभावित करते हुए आगे बढती है |

    इस प्रकार से ग्रुत्वीय बल का स्त्रोत द्रव्यमान होता है | जब,एक पिंड त्वरित गति से वेग करता है, तो वह ग्रुत्वीय क्षेत्र में विरूपण की लहरों के तौर पर ग्रुत्वीय उर्जा उत्सर्जित करता है,जो प्रकाश की गति से उर्जा को लेकर अपने मार्ग में पड़ने वाले पदार्थों को धकेलते और खीचते हुए दिक्-काल में गमन करता है | हम जानते है कि ग्रुत्वाकर्ष्ण बल विद्युत चुम्बकीय बल से काफी कमजोर होता है, परिणामत: विद्युत चुम्बकीय तरंगो की तुलना में ग्रुत्वीय तरंगो द्वारा परिवाहित की गयी उर्जा नगण्य होती है, जिससे उनका प्रेक्षण काफी मुश्किल हो जाता है | अब जैसे , जब धरती चक्राकार पथ में सूर्य की परिक्रमा करती है तो यह गुरुत्वीय तरंगे उत्सर्जित करती है | लेकिन पूरी धरती के लिए गुरुत्वाकर्षण तरंगों का उत्पादन सिर्फ कुछ 100 वाट्स का है, जिसे मापा ही नही जा सकता | हमारा सूर्य भी गुरुत्वीय तरंगे छोड़ता है, जैसे वह विद्युत् चुम्बिकीय तरंगे चोदता है, परन्तु इसके स्वर ऊष्मा और प्रकाश के तौर पर उत्सर्जित की 400 मिलियन ट्रिलियन मेगावाट की तुलना में सिर्फ 79 मेगावाट की उर्जा गुरुत्वीय तरंगो द्वारा उत्सर्जित करता है | फिर से, यह मात्रा पहचाने जा पाने के लिए भी नाकाफी है |

    खुशकिस्मती से, हमारे पास गुरुत्वाकर्षण तरंगो के मजबूत और बड़े स्रोत मौजूद हैं | एक ऐसे स्रोत को जोसफ टेलर और रसेल हल्से ने शुन्ध था, 1974 में एक बाइनरी पल्सर, अर्थात ऐसा पल्सर जो किसी दूसरे तारे की परिक्रमा करता, इस बात पर पक्का यकीं था की दूसरा तारा एक न्यूट्रॉन तारा है |

    लीगो कहानी की शुरुआत

    1960 के दशक में अमेरिकी और सोवियत वैज्ञानिकों ने गुरुत्वीय तरंगो की खोज के लिए लेज़र इंटरर्फोर्मेट्री (LASER Interferometry) के मूल विचार को प्रतिपादित किया } 1967 में रेनर विस ने लेज़र इंटरफोर्मेट्री का मूल्यांकन किया और अगले वर्ष कीप थरों ने इसकी सैधांतिक विकास की शुरुआत की | बहुत सारे प्रोटोटाइप इंटरफोर्मेटर भी दो दशकों के दौरान प्रस्तावित किये गए, लेकिन वे वित्त पोषण पाने में असफल रहे या वे आगे कोई तकनीकि योजना तैयार नहीं कर सके | हालाँकि, 1980 ने एन.एस.ऍफ़. (NSF) ने एम आई टी (MIT) के नेतृत्व में एक बड़ी इंटरफोर्मेट्री में अध्ययन को फंड किया और कैलटेक में एक 40 मीटर का प्रोत्य्पे बनाया गया | NSF के दबाव में बड़े संसथान एक साथ आये और लीगो पहल पर नेतृत्व किया | 1994 में, जब बेरी बेश प्रयोगशाला निदेशक के तौर पर आये, तब लीगो को यह बताया गया की फंडिंग पाने के लिए यह इसका आखिरी प्रयास था, परन्तु एक संशोधित सैद्धांतिक, बजट और प्रोज़ेक्ट प्लान हरी बत्ती और फंडिंग पाने में सफल रहा | 395 मिलियन डॉलर पर यह प्रोज़ेक्ट, पहली बार 1994 में धरातल पर उतरा और इसका निर्माण 1997 में पूरा हुआ |

    2002 से 2010 तक हुए शुरूआती परीक्षणों में लीगो ने कोई गुरुत्वीय तरंगे ज्ञात नही किये | इसलिए इसे उपकरणों में सुधर के लिए बंद कर दिया गया, जिससे इसकी संवेदनशीलता एक मात्रा तक बढ़ी | यह सितम्बर 2015 था, जब लीगो दूसरे भाग में शुरू हो पाया |

    इसी समय, इस इटली में स्थापित लेज़र इंटरफोर्मेटर, वर्गो (VIRGO) ने भी 2015 में गुरुत्वीय तरंगे पता लगाने के लिए काम शुरू किया |

    इसमें शामिल वैज्ञानिको को अपार ख़ुशी हुयी, जब 14 सितम्बर 2015 इसने पहला सिग्नल पता किया, जो सौर द्रव्यमान से 29 और 36 गुना बड़े दो विशाल ब्लैक होल के मिलने से पैदा हुआ था | ये मिलकर एक अत्यंत विशाल ब्लैक होल बन गया जिसका वजन सौर द्रव्यमान का 62 गुना, जो 1.3 खरब प्रकाश वर्ष की दूरी ब्रह्माण्ड के एक कोने में हुआ | इसके कारन गुरुत्वीय तरंगे उत्सर्जुत हुयीं, जो 3 सौर द्रव्यमान के बराबर था | ये परिणाम 11 फरवरी 2016 को प्रकाशित किये गए जिसमे लीगो तथा वर्गो के वैज्ञानिक सहयोग ने गुरुत्वीय तरंगो के प्रत्यक्ष डिटेक्सन को पक्का किया | नवम्बर 2017 तक, लीगो ने इसी तरह के सिग्नलों के चार डिटेक्सनों के घोषणा की है |

    लीगो की संरचना

    लीगो में दो इंटरफोर्मेटर है, एक हेन्फोर्ड वाशिंगटन थे और दूसरा लिविन्ग्स्टोन, लुसियाना में, जिनके बीच की दूरी प्रकाश के चार समय के 10 मिलिसेकंड के बराबर होता है | संभवतः 2400 मिल हर प्राइमरी इंटरफोर्मेटर में 2-4 किमी लम्बी लाइने एक दुसरे से ओर्थोगोनल हैं जो परिक्षण द्रव्यमान को प्रतिस्थापित करता है, जिससे रीसाइकल्ड उर्जा वाला माईकल्सन इंटरफोर्मेटर बनता है | एक पूर्व-स्थापित Nd:YAG लेज़र सोत से 20 वाट शक्ति का 1064 nm तरंग-धैर्य वाला करांग उत्सर्जित होता है | आंशिक रूप से – प्रतिबिंबित वाले दर्पणों के प्रयोग से, फेबरो-पेरोट प्रतिध्वनि-गुहाएँ दोनों भुजाओं पर निर्मित की जाति हैं, जुस्से परकश की किरण द्वारा तय की गई दूरी का मान बढ़ जाता है | 4 किमी की भुजा पर 280 व्हाक्कर पूरे करने के बाद वे बीम स्पिल्टर पर मिलते हैं | उपकरण को इस प्रकार रखा जाता है कि ये दो प्रकाश-पुंज चरण के बहार होते हैं और विध्वंशक रूप से हस्तक्षेप करते हैं और फोटोडायोड पर कोई प्रकाश नहीं पड़ता है |

    अब, जब गुरुत्वीय तरंगे इंटरफोर्मेटर से होकर गुजरता है, यह दोनों भुजाओं में मौजूद परिक्षण-द्रव्यमानों की उत्तेजित करता है, इससे भुजाएं बहुत ही कम मात्र में छोटी व लम्बी होती हैं, इससे प्रकाश-पुंज थोड़ा-सा चरण के बहार चला जाता है, जिससे प्रतिध्वनि होती है और फोटोडायोड पर प्रकाश डिटेक्ट होता है | दोनों इंटरफोर्मेटर से मिले परिणामो की तुलना और विश्लेषण करने पर पाया गया कि ये एक-सामान हैं, इससे यह साबित हो गया की परिक्षण-द्रव्य्मानो का संचलन एक ही किस्म के विरूपम के कारण है, न की किसी भूकंपीय या मानव गतिविधि के कारण |

    हर परिक्षण-द्रव्यमान में बेहद सवेदनशील सेंसर लगे हुए थे, जो 1 एटोमीटर (10-18 – 10-19 m) तक की किसी करकट को माप सकते थे | ये सेंसर्स 1 प्रोटोन के दस हजारवें हिस्से के बराबर विस्थापन तक को माप सकते हैं | यह अल्फा सेंचुरी तक की दूरी को बाल के बराबर सूक्ष्मता से मापने के बराबर है | लेकिन इस अति संवेदनशीलता की एक खामी भी थी, ये सिग्नल सेस्मिक गतिविधियों या ट्रैफिक से भी बाधित हो सकते थे | इसके प्रभाव को ख़त्म करने के लिए परिक्षण-द्रव्यमानो को सक्रिय और निष्क्रिय उदासीनता वाले उपायों से लैस किया गया | सक्रिय उदासीनता उसी तरह काम करता है जिस तरह से शोर कम करने के लिए हैडफ़ोन काम करता है, ऐसा सेंसर लगाया जाता है जो आस-पास के शोर को मापता है और उपकरण को इस शोर को नकारने के बारे में सूचित करता है | दूसरा, यह सिस्टम ऐसे किसी भी हरकत को परिक्षण-द्रव्यमान तक पहुँचने से रोकता है, जो सक्रिय सिस्टम द्वारा विरोध नही किया गया है | परिक्षण-द्रव्यमान (दर्पण) को 4 चरण पेंडुलम जिसे क्वाड (quad) कहा जाता है, उसे लटकाया जाता है | इसे 0.4 mm मोटी फ्यूज़ड सिलिका ग्लास फाइबर से लटकाया जाता है | चार वाइब्रेशन डैम्पिंग द्रव्यमान भी पेंडुलम में मौजूद होता है, जो वाइब्रेशन अवशोषित कर लेता है | मुख्य जंजीर वाला हिस्सा लेज़र बीम की ओर होता है, जब प्रतिक्रिया-द्रव्यमान वाला हिस्सा परिक्षण-द्रव्यमान को खागौलिय स्रोतों से नहीं आने वाले शोर के बावजूद स्थिर रखता है | जड़त्व के कारण, इन द्रव्यमानों का वजन भी वाइब्रेशन को डैम्प करने में सहायता करता है |

    इसलिए जो भी हरकत परिक्षण-द्रव्यमान से मापी जाति है, वह सिर्फ दिक्-काल में गुरुत्वीय तरंग के कारन हुयी हरकत में ही होता है |

    अच्छा, तो आइन्स्टाइन सही थे ; पर गुरुत्वीय तरंगें क्यों महत्वपूर्ण हैं ?

    गुरुत्वीय तरंग खागौलविज्ञान में एक ने युग की शुरुआत करेगा | अतीत में खागौलविज्ञान में की गयी ज्यादातर खोजें विद्युत चुम्बकीय विकिरण (दृश्य प्रकाश, रेडियो तरंग, एक्स-रे, आदि), अलग-अलग प्रकारों पर निर्भर रही है | परन्तु, विद्युत चुम्बकीय तरंगें स्रोत और हमारे बीच होने वाले किसी भी पदार्थ से आसानी से परिवर्तित और अवशोषित हो जाती है | यहाँ तक की प्रकाश भी जब धरती के वायुमंडल में मौजूद गैस के बादलो से होकर गुजरता है, प्रकाश का कुछ हिस्सा अवशोषित हो जाता है और यह प्रेक्षित नही हो पाता है |

    वह भौतिकी जो गुरुत्वीय तरंगो के निर्माण में लगी है, तरंग में ही कूटबद्ध है | इस सूचना को पाने के लिए गुरुत्वीय संसूचक रेडियो की तरह ही काम करेंगे | जिस तरह रेडियो, रेडियो-तरंगो में कूटबद्ध संगीत को उद्धरित करता है- लीगो भी गुरुत्वीय तरंग अवशोषित करके, उसे बाद में विकूटित कर उसके भौतिक अस्तित्व की जानकारियाँ निस्सारित कर पायेगा | इस तरह से लीगो सही मायनों में एक वेधशाला है, हालांकि इसमें परम्परागत टेलिस्कोप नही है | परन्तु, ग्रुत्वीय तरंगो के अनुसन्धान के लिए आवश्यक आंकड़ो के विश्लेषण की परम्परागत मात्रा प्रकाशीय टेलेस्कोप की तुलना में ज्यादा है, इसलिए वास्तविक समय में गुरुत्वीय तरंग का प्रेक्षण भी सम्भव नही है | अत: संसूचक आंकड़ो का एक लेखा-जोखा रखता है | इसलिये लीगो परम्परागत वेधशालाओं से सहयोग करते वक्त एक फ़ायदा देता है, चूँकि लीगो में “रिवाइंड” की सुविधा है जो टेलेस्कोपो में नही है | एक सुपरनोवा की कल्पना करे जिसे शुरूआती विस्फोट के बाद प्रेक्षित किया गया है | लीगो शोधकर्ता सुपरनोवा की शुरुआत के वक़्त बने गुरुत्वीय तरंग की खोज के लिए आंकड़ो में पीछे जा सकते है |

    – अर्नव पुष्कर (अंग्रेजी से अनुवाद – विवेक कुमार)

  • स्टीफन हॉकिंग – एक भौतिकवादी वैज्ञानिक

    स्टीफन हॉकिंग – एक भौतिकवादी वैज्ञानिक

    आज विज्ञान का हर छात्र स्टीफन विलियम हॉकिंग के नाम से परीचित है | स्टीफन हॉकिंग महान भौतिक शास्त्री खगोलविद लेखक और विज्ञान के व्याख्याता के रूप में जाने जाते हैं | वे एक भौतिकवादी वैज्ञानिक थे जो लगातार विज्ञान को नई परिधि तक ले जाने में लगे रहे | इसी वर्ष 14 मार्च को हमेशा व्हील चेयर पर बैठे रहने वाले वह महान सख्श जिसके शारीर का कुछ हिस्सा ही काम करता था, के बाकि हिस्से ने भी काम करना बंद कर दिया, उन्होंने हमेशा के लिए हमें अलविदा कह दिया | इत्तेफाक से इसी दिन महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइन्स्टीन का जन्मदिन भी है | दूसरे शब्दों में कहें तो इतिहास ने अपना एक दिन दो ऐसे महान एवं न्यायप्रिय वैज्ञानिकों के नाम कर दिया जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी ज्ञान को नए धरातल पर ले जाने में लगा दी एवं अब तक प्राप्त समूचे मानव ज्ञान को मानवता के लिए उपयोग करने की वकालत करते रहे | 

    स्टीफन हॉकिंग का जन्म 8 जनवरी 1942 को इंग्लैंड के ऑक्सफ़ोर्ड में हुआ | यह एक ऐसा समय था जब विज्ञान ने कलासिकीय अवधारणा को पीछे छोड़ दिया था | नियत्त्ववाद (Determinism) और अज्ञेयवाद(agnostism) के द्वन्द्व से पदार्थ के सार एवं ब्रह्माण्ड के विकास को जानने की कोशिश की जा रही थी(नियतत्ववाद यह मानता है कि ब्रह्माण्ड और प्रकृति को पूर्ण रूप से जाना जा सकता है और इसका अंतिम लक्ष्य एक ऐसे सिद्धांत को खोजना है जो हर चीज़ को परिभाषित कर सके जबकि अज्ञेयवाद के अनुसार हर प्रेक्षक का अपना यथार्थ होता है और इसीलिए वास्तु के सार को या यथार्थ को कभी नहीं जाना जा सकता ) | एक तरफ अलबर्ट आइन्स्टीन , इरविन शोडिंगर जैसे वौज्ञानिक थे वहीं दूसरी तरफ थे बोर और हाईजनबर्ग | जहाँ अकादमिक क्षेत्र में बहसों और खोजों का सिलसिला जारी था वहीँ दूसरी ओर ये दुनिया मुनाफे की अंधी हवस और साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा के कारण मानवता हिरोशिमा और नागासाकी के रूप में सबसे बड़ी तबाही देखने वाली थी |

    युवा स्टीफन हॉकिंग

    एक आम छात्र की तरह ही हॉकिंग ने भी स्कूली शिक्षा ग्रहण के बाद ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में स्नातक किया जहाँ विज्ञान और ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति में उनकी रुचि बढ़ने लगी | इसके बाद कैंब्रिज विश्वविद्यालय में डाक्टरल करने के दौरान जब वे सापेक्षता के सिद्धांत पर कम कर रहे थे, तब मात्र 22 साल की उम्र में मोटर न्यूरॉन डिजीज़ ने उन्हें अपने पंजे मे जकर लिया जो एक-एक कर के पूरे शरीर को लकवाग्रस्त करने वाला था | इस कारण स्टीफन कुछ दिन के लिए अवसाद में चले गये | लेकिन उनकी विज्ञान की रूची अवसाद पर भारी पड़ी और जल्दी ही वो विज्ञान की दुनिया में लौट आये |

    इसी समय खगोलशास्त्र में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति को लेकर दो अवधारणाओं के बीच बड़ी बहस चल रही थी | एक खेमा ‘स्टीडी स्टेट थ्योरी’ के साथ था वहीँ दूसरा खेमा ‘बिग बैंग थ्योरी’ के साथ | स्टीडी स्टेट थ्योरी के अनुसार पदार्थ का घनत्व ब्रह्माण्ड के फैलने के बावजूद नहीं बदलता | ब्रह्माण्ड अपनी समसर्वत्रता(homogeneity) बरक़रार रखता है , जबकि बिग बैंग थ्योरी के अनुसार ब्रह्माण्ड की शुरुआत अनंत घनत्व और तापमान से हुई थी | इसके बाद ब्रह्माण्ड लगातार फ़ैल रहा है , लेकिन दोनों ही अवधारणाओं का कोई अवलोकन या गणितीय सूत्र नही प्रस्तुत किया गया था | स्टीफन हॉकिंग ने 1965 ने रोजर पेनरोज़ के ब्लैक होल के केंद्र के लिए अद्वैत के सिद्धन्त को पूरे ब्रह्माण्ड पर लागू कर के और फिर उनके साथ मिलकर दिक्-काल अद्वैत (space-time singularity) का सिद्धांत दिया और गणितीय सूत्र के जरिए बिग बैंग थ्योरी को सही साबित किया | अपने कम को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने 1970 में ये साबित किया कि अगर ब्रह्माण्ड सापेक्षता के सिद्धांत पर काम कर रही है तो वह अद्वैत के सिद्धांत और अलेक्स्जेंडर फ़्राईडमैन के फिजिकल कॉस्मोलोजी के सिद्धांत का भी पालन करती है |

    दिक्-काल अद्वैत

    1973 में रूसी यात्रा के दौरान वहां के दो वैज्ञानिकों याकोव बोरिसोविच ज़ेल्दोविच, एलेजी स्टारोबिन्सकी से हुए विमर्श ने हॉकिंग को क्वांटम मैकेनिक्स और क्वांटम ग्रेविटी पर काम करने को प्रेरित किया | इसी दौरान 1974 में हॉकिंग ने ब्लैक होल द्वारा विकिरण का पता लगाया जिसे ‘हॉकिंग रेडिएशन’ के नाम से जाना जाता है | ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और गतिकी समझने के लिए हॉकिंग लगातार सैद्धांतिक भौतिकी के दो अंतर्विरोधी छोरों क्वांटम और सापेक्षिता के सिद्धांत को एक ही समीकरण द्वारा प्रतिपादित करने में लगे रहे जिसे उन्होंने ‘थ्योरी ऑफ़ एवरीथिंग’ कहा | हॉकिंग का योगदान सिर्फ गणितीय सूत्रों को हल करने या अकादमिक क्षेत्र तक सिमित नही था | उनका मानना था ज्ञान, विज्ञान, दर्शन कुछ लोगों के लिए नहीं बल्कि दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति के जानने-समझने और चर्चा का विषय है | अपनी किताब ‘अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम’ में वे कहते हैं –

    “अगर हम ब्रह्माण्ड का एक पूर्ण सिद्धान्त खोज पायें तो वक्त के साथ इसके सामान्य तत्त्व सिर्फ कुछ वैज्ञानिकों के ही नही बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के समझने लायक होने चाहिए, तब हम सब इस चर्चा में भाग ले सकेंगे की हम और ये ब्रह्माण्ड क्यों अस्तित्वमान हैं |”

    यही कारण था कि हॉकिंग विज्ञान को और खास कर खगोलशास्त्र को जहाँ तक हो सके आसान भाषा में आम लोगों के बीच भी ले जा रहे थे | उन्होंने कई किताबें लिखीं जिनमे बच्चों के लिए अलग से आधे दर्जन फिक्शन किताबें भी शामिल हैं | इस कारण हॉकिंग दुनिया के तमाम छात्रों के बीच लोकप्रिय हुए | इसके साथ ही हॉकिंग तार्किकता और विज्ञान पर हो रहे दार्शनिक हमलों का भी जवाब देते रहे | सैद्धांतिक तौर पर गणितीय सूत्र तो खोजे जा रहे थे मगर उनकी व्याख्या भाववादी और अधिभूतवादी तरीके से की जा रही थी | ये व्याख्याएं वैज्ञानिक तर्क को अलग कर के ईश्वरीय सत्ता और निरपेक्ष सत्य की बात करती थी | स्टीफन लगातार ऐसी अवधारणाओं को ख़ारिज कर के भौतिकवादी व्याख्याएँ प्रस्तुत कर रहे थे | 1983 में हॉकिंग ने जिम हर्टले के साथ मिलकर हर्टले-हॉकिंग मॉडल प्रस्तावित किया | इसके अनुसार प्लैंक काल के पहले दिक्-काल में ब्रह्माण्ड की कोई सीमा नही थी, बिग बैंग के पहले काल की मौजूदगी ही नहीं थी | अतः ब्रह्माण्ड की शुरुआत यह निरपेक्ष सत्य की बात करना व्यर्थ है | इस सिद्धांत ने पुराने क्लासिकीय अद्वैत के सिद्धांत में बदलाव लाये जिसने भाववादी व्याख्या को करारा जवाब दिया | 1990 के बाद के समय का बड़ा हिस्सा हॉकिंग ने विज्ञान व्याख्याता के रूप में गुजरा | साथ ही विज्ञान के सैद्धान्तिक और दार्शनिक के पहलू पर भी काम करते रहे |

    हॉकिंग राजनीतिक रूप से न्यायप्रिय इन्सान भी थे | कई वैज्ञानिकों की तरह वे साम्राज्यवादी युद्ध, हथियार और मानवता की हत्या के प्रखंड विरोधी थे | वियतनाम कत्लेआम हो या इराक युद्ध हो या फिर न्यूकिलियर हथियार, हॉकिंग ने कई मौकों पर इसका विरोध किया | सीरिया में किये गए कत्लेआम पर ‘गौर्डियन’ अख़बार में लिखे अपने लेख में हॉकिंग ने इसकी कड़ी आलोचना की | उन्हें उनकी मानवजाति की सेवा में अपना शत-प्रतिशत योगदान देने की कोशिश को नही भुलाया जा सकता पर उनकी दार्शनिक सीमायें भी थीं | वे द्वंवावात्मक भौतिकवादी पद्धति से परिचित नही हो सके | यही कारण था कि वे इस सड़ती व्यवस्था के विकल्प तक नही पहुँच सके | इंग्लॅण्ड में वे लेबर पार्टी के समर्थक थे जिसके नाम में लेबर है लेकिन सेवा पूंजीपतियों और धन पशुओं की ही करती है | हालाँकि अपने जीवन के आखरी समय में वे इस मुनाफाखोर व्यवस्था की जड़ तक पहुँच गये थे | उन्होंने 2015 में पूँजीवाद को सारी दिक्कतों की जड़ बताते हुए कहा था –

    “अगर यांत्रिकी हमारी जरुरत के हर सामान उत्पन्न करता है तो नतीजा इस बात पर निर्भर करता है कि चीजों का बटवारा कैसे होता है | हर आदमी सुविधापूर्ण और फुरसत भरे क्षण तभी बिता सकता है जब मशीनों द्वारा पैदा किये गये संपदा को साझा किया जाये, नही तो ज्यादातर लोग आभाव में ही जियेंगे, अगर मालिकना हक कुछ लोगों के हाथ में हो | अगर ऐसा ही रहा तो यह तकनीक सिर्फ गैर बराबरी ही पैदा करेगी |”

    इसके साथ ही ये मुनाफाखोर व्यवस्था के नुमाईन्दे जो लगातार मानवता को फंतासी जैसे आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस और आसमानी दुनिया का डर दिखाकर अपनी सत्ता बचाने का कम कर रहे है, का भी स्टीफन हॉकिंग ने अपने आखरी सालों में प्रखर विरोध करते हुए कहा कि मानवता को मशीन से ज्यादा खतरा पूंजीवाद से है |

    कुल मिला कर कहा जाये तो स्टीफन हॉकिंग ताउम्र शोशक व्यवस्था के खिलाफ़ रहे | हमेशा ही इस मुनाफाखोर व्यवस्था द्वारा जनित समस्याओं की मुखर आलोचना करते रहे | भौतिकी में भी जब नवकांटवादी तथा भाववादी चिन्तक व वैज्ञानिक इसे अज्ञेयवाद और भाववाद के गड्ढे ने ले जा रहे थे, वे भौतिकवादी चिंतन को आगे बढ़ाते रहे, वह भी उस दौर में जब बड़े-बड़े तर्कहीन दावे और लफ्फबाजियाँ की जा रहीं थीं | गणितीय समीकरणों की मनगढ़ंत व्याख्या की जा रही थी तब भी वो लगातार बहस में लगे रहे | उनको मृत्यु पूरे मानव समाज के लिए अपूरणीय क्षति है | आने वाले स्पार्क के किश्तों में हम स्टीफन हॉकिंग के विज्ञानं में अवदानो पर चर्चा करेंगे |

    – आकाश आनंद