










हवा पानी सब बर्बाद, इसकी जड़ में पूँजीवाद!
24 दिसम्बर 2025 को पटना के बुद्धा स्मृति पार्क पर साइण्टिस्ट्स फ़ॉर सोसायटी और दिशा छात्र संगठन द्वारा मोदी सरकार की पर्यावरण – विरोधी नीतियों के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया गया। सभा की शुरुआत नारों के साथ हुई। सभा को सम्बोधित करते हुए साइण्टिस्ट्स फ़ॉर सोसायटी की तरफ से आकाश ने बात रखते हुए कहा कि आज आम लोगों के बीच साफ हवा और साफ पानी जैसी बुनियादी ज़रूरत पूरी नहीं हो पा रही। एक तरफ़ दिल्ली, पटना, मुम्बई आदि शहरों में लोग अपने बच्चों के फेफड़ों को खराब होता हुआ देखने को मजबूर हैं, ए.क्यू.आई (AQI) इतनी अधिक जा रही है कि इसे जाँचने वाली मशीन भी ऊपरी सीमा के बाद इसे माप नहीं पा रही वहीं दूसरी तरफ़ सरकार पूँजीपतियों को पहाड़, जंगल और तमाम सम्पदा को लूटने की खुली छूट दे रही है। भू-जल में यूरेनियम व आर्सेनिक जैसे खतरनाक पदार्थ पाये जा रहे हैं। आज हालत इतनी ख़राब है कि लगभग 70 प्रतिशत भू-जल पीने योग्य नहीं है। मगर सरकारी नीतियों की बात करें तो यह सीधे प्रकृति की अंधाधुन लूट और पर्यावरणीय विनाश की तरफ़ ले जा रही है। जंगलों की बेतहाशा कटाई की जा रही है। पहाड़ों की असीमित खुदाई की जा रही है। हाल ही में अरावली पर्वत श्रेणियों को बर्बाद करने का फरमान दिया गया है। इसके तहत 90 प्रतिशत अरावली पर्वत श्रेणियों को पर्वत की परिभाषा से ही बाहर कर दिया गया है। पहले ही लगभग 25 प्रतिशत तक अरावली को भू-माफियाओं और रियल एस्टेट माफियाओं द्वारा तबाह किया जा चुका है। खुद सरकार के अनुसार अरावली से सटे राजस्थान के इलाक़े में 27 हजार से ज्यादा गैरकानूनी खनन किए जा रहे हैं। यही हाल झारखण्ड, उड़ीसा, असम, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में जारी है। आरे, हसदेव और निकोबार प्रोजेक्ट के तहत 2 करोड़ पेड़ काटे जाने की योजना है। इन सब में सरकार के साथ पूँजीपतियों और उनके दलालों की मिलीभगत जगजाहिर है। लगातार पूँजीपतियों के मुनाफे की हवस की पूर्ति के लिए सरकार दिलोजान से लगी है। क्योंकि यह सरकार वास्तव में पूँजीपतियों से चन्दे लेकर उनकी जेबों के लिए काम कर रही है।
एक तरफ़ जहां इसे प्राकृतिक आपदा बताने की कोशिश की जा रहे है वहीं दूसरी तरफ़ इसका ठीकरा पूरी मानवजाति पर डाला जा रहा है। मगर सच यह है कि यह व्यवस्थाजनित त्रासदी है। आज पूँजीवादी मुनाफ़ाखोर व्यवस्था जहां उत्पादन के साधनों पर चन्द मुट्ठीभर लोगों का कब्ज़ा है, अपने मुनाफ़े के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। वे न तो फैक्टरियों के अपशिष्ट का प्रबंधन करते हैं और न ही उन्हें ग्लेशियरों के पिघलने और जंगल के कटने से कोई फ़र्क पड़ता है। बिना इस व्यवस्था को बदले पर्यावरण को नहीं बचाया जा सकता है।
आगे, सभा को सम्बोधित करते हुए दिशा छात्र संगठन की वारुणी ने कहा कि आज सिर्फ़ दिल्ली ही नहीं देश भर के कई शहरों में ए.क्यू.आई ख़तरे के निशान से ऊपर है। दिल्ली में आपात स्थिति में लोग रह रहे हैं। इससे बचने के उपाय करने के बजाय सरकार ऊटपटांग बयान देकर जनता की बिगड़ती हालत का मजाक बनाया जाता है। तमाम उद्योगों से निकालने वाले ख़तरनाक गैस और निजी वाहनों से निकालने वाले धुएं जो दिल्ली प्रदूषण का बड़ा कारण हैं, को रोकने और इसका उपाय ढूंढने की जगह तंदूर बैन जैसे मूर्खतापूर्ण फैसले लिए जा रहे हैं। अभी सरकार ने शान्ति(SHANTI) बिल प्रस्तावित किया है, जिसके तहत अब न्यूक्लियर पावर प्लाण्ट भी निजी कम्पनियों को दिये जायेंगे। हमें भोपाल गैस त्रासदी को नहीं भूलना चाहिए जहां मुनाफे की हवस में किस तरह एक कार्बाइड फैक्ट्री की लापरवाही ने रातोरात हजारों जाने ली थी और कई पीढ़ियों को इसने प्रभावित किया है। यह फासीवादी मोदी सरकार आम जनता की ज़िन्दगियों की कीमत पर अम्बानी और अडानी जैसे पूँजीपतियों की सेवा करने में लगी हुई है। आज हमारे पास एकजुट होकर जनांदोलन खड़े करने के सिवा कोई विकल्प नहीं है। यही सरकार इसी संसद सत्र में जो कई घण्टे तक वंदे मातरम पर बहस करती है, परन्तु पर्यावरण के मसले पर बहस करने से बचती फिरती है।
गौरतलब है कि अरावली के मसले पर लगातार जनता सड़क पर उतर रही है। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक सरकार के ख़िलाफ़ आवाज उठ रही है। इस दबाव में सरकार भी पीछे हट रही है। कल शाम ही प्रेस रिलीज़ करके जनता के आक्रोश को अपने शब्दजाल से ठण्डा करने का प्रयास कर रही है। मगर अरावली पर्वत श्रेणी की नयी परिभाषा को वापस लेने से बच रही है। वास्तव में, यह इसी तथ्य का परिचायक है कि सरकार की कथनी और करनी में कभी सामंजस्य नहीं होता। आज पर्यावरण को बचाने की लड़ाई एक-दो दिन के धरना-प्रदर्शन से हल होने वाली नहीं है। इसके लिए लगातार, संगठित और सजग जन-आन्दोलन की ज़रूरत है। हमें इस मुद्दे पर निरन्तर आवाज़ उठानी होगी और पर्यावरण की रक्षा के लिए हर स्तर पर संघर्ष जारी रखना होगा।
इस विरोध प्रदर्शन में शहर के विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्रों और युवाओं समेत आम नागरिक भी शामिल हुए। इसके साथ ही इस प्रदर्शन से सम्बन्धित पर्चे भी लोगों के बीच वितरित किये गये।

